देहरादून: उत्तराखंड में साहसिक और ट्रेकिंग पर्यटन को नई दिशा देने के लिए राज्य सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। प्रदेश के 100 सबसे दुर्गम और चुनौतीपूर्ण ट्रेक रूट्स की GPS और GIS मैपिंग शुरू कर दी गई है। इसके लिए विशेषज्ञों की टीमें चयनित ट्रेकिंग रूट्स के स्थलीय सर्वेक्षण के लिए रवाना कर दी गई हैं।
इस अभियान का उद्देश्य उत्तराखंड के प्रसिद्ध ट्रेकिंग स्थलों के साथ-साथ दूरस्थ और कम चर्चित ट्रेक रूट्स को भी वैज्ञानिक तरीके से मैप करना और उन्हें पर्यटन मानचित्र पर लाना है। मैपिंग पूरी होने के बाद ट्रेकर्स को रूट, ऊंचाई, कठिनाई, पड़ाव और आसपास उपलब्ध सुविधाओं से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी एक ही जगह मिल सकेगी।
ट्रेकिंग को सुरक्षित और सुगम बनाने पर जोर
उत्तराखंड में साहसिक पर्यटन की बड़ी संभावनाओं को देखते हुए सरकार ट्रेकिंग रूट्स को सुरक्षित और व्यवस्थित बनाने पर जोर दे रही है। आधुनिक तकनीक की मदद से होने वाली GPS और GIS मैपिंग से ट्रेकर्स को रास्तों की सटीक जानकारी मिलेगी।
पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा देने के साथ पर्यटकों की सुरक्षा को भी प्राथमिकता दी जा रही है। किसी आपात स्थिति में वैज्ञानिक तरीके से तैयार किए गए रूट मैप SDRF, वन विभाग और अन्य रेस्क्यू टीमों के लिए काफी उपयोगी साबित हो सकते हैं।
पहाड़ी क्षेत्रों में कई बार नेटवर्क और स्पष्ट रास्ते की कमी के कारण ट्रेकर्स रास्ता भटक जाते हैं। नई मैपिंग व्यवस्था के बाद इन रूट्स की सटीक लोकेशन और मार्ग की जानकारी डिजिटल रूप से उपलब्ध कराने की योजना है।
मैपिंग में सिर्फ रास्ता नहीं, पूरी जानकारी मिलेगी
पर्यटन सचिव धीराज गर्ब्याल के अनुसार, GPS-GIS मैपिंग के दौरान केवल ट्रेकिंग रूट को चिन्हित नहीं किया जाएगा, बल्कि रास्ते में मौजूद जरूरी सुविधाओं और महत्वपूर्ण स्थानों की लोकेशन भी दर्ज की जाएगी।
मैपिंग में मुख्य रूप से ये जानकारियां शामिल होंगी:
- ट्रेकिंग रूट और उसकी सटीक लोकेशन
- रास्ते की ऊंचाई और कठिनाई का स्तर
- महत्वपूर्ण पड़ाव
- दुकान और अन्य जरूरी सुविधाएं
- गांव और होमस्टे की लोकेशन
- SDRF और वन विभाग के लिए संभावित रेस्क्यू पॉइंट
- आपातकालीन परिस्थितियों में उपयोगी अन्य स्थान
- इससे ट्रेकर्स को यात्रा शुरू करने से पहले पूरे रूट की बेहतर जानकारी मिल सकेगी।
5,700 से 7,756 मीटर तक ऊंची चोटियां शामिल
उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं मंडल में स्थित इन 100 ट्रेक रूट्स में कई ऊंची और चुनौतीपूर्ण पर्वत चोटियों के क्षेत्र शामिल हैं। इनमें कामेट, नंदा देवी (पूर्वी), चौखंबा, त्रिशूल, शिवलिंग, सतोपंथ, पंचचूली और नीलकंठ जैसी चोटियां शामिल हैं।
इन क्षेत्रों की ऊंचाई करीब 5,700 मीटर से लेकर 7,756 मीटर तक बताई गई है। ऐसे में इन रूट्स की सटीक डिजिटल मैपिंग पर्वतारोहियों और ट्रेकर्स के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
बिना नेटवर्क के भी काम करेगा नेविगेशन ऐप
GPS-GIS मैपिंग के बाद पर्यटन विभाग एक विशेष नेविगेशन ऐप विकसित करने की योजना पर काम कर रहा है। खास बात यह होगी कि ऐप ऑनलाइन के साथ-साथ ऑफलाइन मोड में भी काम करेगा।
यानी पहाड़ों में मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में भी ट्रेकर्स रूट की जानकारी और नेविगेशन का इस्तेमाल कर सकेंगे।
अगर कोई ट्रैकर निर्धारित रास्ते से भटकता है, तो ऐप के जरिए उसे गलत रूट पर जाने को लेकर अलर्ट मिलने की व्यवस्था की जाएगी। इससे ट्रेकर्स को समय रहते सही रास्ते पर लौटने में मदद मिल सकती है।
साथ ही, किसी आपात स्थिति में SDRF और रेस्क्यू टीमों के लिए ट्रैकर की लोकेशन तक पहुंचना भी आसान हो सकता है। विभाग की योजना के अनुसार, ट्रेकिंग की अनुमति से पहले इस ऐप को डाउनलोड करना अनिवार्य किया जा सकता है।
स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर
सरकार को उम्मीद है कि इस पहल से राज्य के दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा। ट्रेकिंग रूट्स के व्यवस्थित विकास से स्थानीय युवाओं के लिए ट्रेकिंग गाइड, होमस्टे, स्थानीय पर्यटन सेवाओं और अन्य गतिविधियों में रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं। दूरस्थ क्षेत्रों को पर्यटन मानचित्र पर पहचान मिलने से स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
83 चोटियों के बाद अब 100 ट्रेक रूट्स पर फोकस
पर्यटन विभाग इससे पहले पर्वतारोहण और ट्रैकिंग गतिविधियों के लिए 83 चोटियों को खोले जाने की पहल कर चुका है। अब 100 दुर्गम ट्रेक रूट्स की GPS और GIS मैपिंग को साहसिक पर्यटन के विस्तार की दिशा में अगला महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
इससे राज्य के कम चर्चित लेकिन प्राकृतिक और साहसिक पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्रों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की कोशिश की जा रही है।
DPR और कॉफी टेबल बुक भी होगी तैयार
इस पूरी परियोजना के तहत Detailed Project Report (DPR) तैयार करने के साथ-साथ एक कॉफी टेबल बुक भी तैयार की जाएगी। इसमें उत्तराखंड के महत्वपूर्ण ट्रेकिंग क्षेत्रों और उनकी विशेषताओं को शामिल किया जाएगा।
इस पहल का व्यापक उद्देश्य दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों को नए पर्यटन गंतव्यों के रूप में विकसित करना, स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाना और ट्रेकिंग को ज्यादा सुरक्षित, व्यवस्थित और तकनीक आधारित बनाना है।
GPS-GIS मैपिंग और ऑफलाइन नेविगेशन जैसी तकनीकों के इस्तेमाल से उत्तराखंड के साहसिक पर्यटन को एक नया डिजिटल आधार मिलने की उम्मीद है।
